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Showing posts from October, 2018

लोग कहते तो है पर बेटियां पराई नहीं होती..

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वो भोली सी सूरत वो प्यारी सी शाम... किल्कारिओ की आँगन, रौशन मकान.. ... बधाइयों के मेले.. धीमी सी मुस्कान.. मगर फिर भी दिल दुखी है... ..............................वाह रे इंसान जना जिसे माँ ने वो दीपक नहीं था.. कुल का वारिश नहीं है, बेटा नहीं था.. ... मगर नन्ही सी कोमल बाती जरूर है... तेरे हर मुसीबत में साथी जरूर है क्या हुआ अगर आँगन में गुड़िया खेलेगी पापा के बाँहों में झूला झुलेगी.. ....अगर ख़्वाइसों  के पर भी निकले तो.. क्या हुआ अगर वो कोई ख़्वाब ही बून ले तो.. ..बेटियां है वो, मूरत नहीं है... जिन्दा है तो कोई मंजिल ही चुन ले तो.. .. लाचार होती है बेटियां ये समाज कहता है.. मगर कल्पना कमजोर नहीं थी ये हर आवाज कहता है.. बराबर का मौका दे कर तो देखो  छु लेगी मुकद्दर, समय का आगाज कहता है... ..  बेटियों को जनने से रुस्वाई नहीं होती... लोग कहते तो है, पर बेटियां पराई नहीं होती।।                                              -स...

मौत तू कड़वी सच्चाई है...

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ए मौत तू सच नहीं, ........कड़वी सच्चाई है। तू इतना नासमझ है, न मजबूरिया समझता है, न उम्र का महत्व... चल सुन आज मेरे दर्द का समंदर, मैंने देखा है अपनो को तेरी आगोश में जो कुछ घंटों पहले अपनी हंसी से शोर मचा रहा था। हाँ, उसके उस शांत निर्जन शरीर ने तोड़ दिया मुझे, अगर तू भी मेरी नजर से देखता,  तू भी बिखड़ जाता। मैन सहा है उन पलों को,  जो मेरी दुनिया के अनमोल सितारे थे, बिखरे थें मेरी गोद में तुझे गले लगाकर, जो मेरे आँसू न देख सकते कभी,  आज तुझे पाकर... वो मेरे कराहते दिल को न सुन पा रहे है। ये मौत तू सच नहीं, कड़वी सच्चाई है, क्या तुझे दर्द नहीं दिखता,  उन मजबूर मरीजों का... जो अस्पतालों के पंक्तियों में  झुकी हड्डियों पर जीवन की आश देखते है,  क्या तुझे तनिक भी दया नहीं आती,  उन मासूम बच्चों पर  जो  बिना तुम्हें समझे अपनी जिंदगी अस्पतालों के कठोर बिस्तर पे गुजार रहें है, अगर तू उन अबोध को भी एक उम्मीद नहीं दे सकता तो सुन, ए मौत तू सच नहीं, कड़वी सच्चाई है। मैं कैसे बया करू अपने दर्द को  क्या बताऊँ  की अपने ...

कैसे कहूँ....

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इन आँखों की रवानी भी कैसे कहूँ.. हाल-ए-दिल जुबानी भी कैसे कहूँ समझ नहीं आता तेरे इन्तेजार में जीकर तेरी बेरुखी को तेरी नादानी भी कैसे कहूँ.. कभी रात के चकोरों से तेरा हाल पूछता हूँ.. रंगीन तितलियों से सूरत-ए-बहाल पूछता हूँ.. पता है कई राज छुपाए हो मुझसे.... मगर उन बहानो को कहानी भी कैसे कहूँ.. तेरे मुस्कुराहटों के पीछे के आँशु को देखे है मैंने... तुम चाह कर भी दूर नहीं हो मुझसे... धड़कता आज भी दिल तुम्हारा मेरे लिए है मगर इन दूरियों को आख़री निशानी भी कैसे कहूँ...।                                                     -सौरभ कुमार