मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ..

मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ..

एक हसीन सी ख़्वाब के सहारे जी रहा हूँ...
मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ...

इश्क़ कहते है लोग जिन बेचैन धड़कनो को...
...झेल कर उन धड़कनों के नज़ारे, जी रहा हूँ..

वो मधुरई शाम सी आँखों के बेचारे मर रहा हूँ...
वो मुश्कान की मासूमियत के सहारे जी रहा हूँ...

देखता हूँ तुम्हे जब भी अक्स आईने के आगे...
.... ढूंढता हूँ खुद में.. मिलन मोह के धागे...
मैं काबिल भी हूँ तेरे साथ चलने को...विचारे जी रहा हूँ..
मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ..।।

                                            -सौरभ कुमार

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