वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए..

वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए

वो कांपते होठ भी होंगे...जिन्हें कुछ कहना होगा...
वो टिमटिमाते नजरों के धुंधले नज़ारे होंगे
मगर एक अजीब सी बेचैनी तड़प रही सिने में
वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए.....
..
जिया होगा मुकद्दर तक इन्तेजार की बाँहों में..
तिल तिल मरा होगा मुहब्बत, सुलगते दिल के आहों में..
मगर दिल-ए-तमन्ना है.. मुलाकात भी होगी..
बस...
वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए....
..
उम्रे तमाम बीती होगी.. उम्मीदें तमाम ख़त्म होंगे..
गिनती बची सांसो की हो रही होगी..
आखरी दीदार जनाजे की तैयारी पुरे को होने होंगे..
दुआएं शांत यात्रा की किये जा रही होगी..
उस पल भी जहन में एक बात गूंजेगी..
ये आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए...
..
इन्तेजार तमाम उम्र की जान के, मुकद्दर तुम न होओगे..
जिया दुनिया के रश्मो से.. सोचा खुश तुम तो होओगे..
..मगर चाहत-ए-इश्क़ एक बाकी थी.. रूबरू हम भी होयेंगे..
ढूंढती, जागती, तड़पती आँखों के सपनों में....एक दफा हम भी खोएंगे..
मगर वक्त के गुजरते दौर ने कब उम्र तमाम ख़त्म कर दी होगी
साँस कुछ बाकि कुछ चल रही होगी
वो आखरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए.....।।

                                                     -सौरभ कुमार

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