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होलिका जलाओगे क्या?

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मुझे नोचा है किसी ने, कोई जलाने आया है, सब हँस रहे मेरी हालत पे, पर न कोई बचाने आया है, समाज ने मुझे ही बदचलन कह दिया, क्या तुम भी ये लांछन लगाओगे क्या? बताओ न भैया होलिका जलाओगे क्या? मुझे नोचा गया तुम नशे कर रहे, मेरी हत्या हुई, तुम मजे कर रहे,  हत्यारे शान से चलते, मैं जलाई जा रही, अब मेरी राख से होली मनाओगे क्या? बताओ न भैया होलिका जलाओगे क्या? मेरा कसूर क्या था संवारा तो आपने था, मेले में झुमके, सुनार से पायल दिलाया तो आपने था, मैं तो खुद को भैया की दुलारी समझती थी, मैं तो दुलारी थी आपकी अब  भी बताओगे क्या? बताओ न भैया होलिका जलाओगे क्या?

bhima ki nishani hai

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अगर तू मौत भी है तो मुझे इश्क़ है तुमसे...

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अगर तू मौत भी है तो मुझे इश्क है तुमसे.. कभी फिजाओ सी गुजरती हो, कभी खुशबु संग बिखरती हो, पहली नजर से अभी तक तुम, नजर में हर रोज़ निखरती हो.. अब बताऊ भी इसे कैसे, छुपाऊ भी इसे कैसे अगर तू मौत भी है तो मुझे इश्क़ है तुमसे..... कभी बिखरी जुल्फों में देखा था.. उस खुबशुरत चाँद के टुकरे को, नजरों में समा रख्खा था, उस दिलबर के मुखरे को, मगर उस वक्त फिसल के नज़ारे महज पल भर में नजर से गुम हो बैठे जिस पल रूबरू नाचीज़ से तुम हो बैठे सुखी हलक से बात निकले भी तो अब कैसे अगर तु मौत भी है तो, मुझे इश्क़ है तुमसे...  ये इम्तेहां नहीं है इन्तेजार की.. बस देर है हिम्मत-ए-इकरार की मोहब्बत में आर की या पार की मगर डरता है ये बेहाल-ए-दिल... जग रुस्वाई न हो मेरे प्यार की इस तरह रुकी है दिल में ये बात भी कबसे अगर तू मौत भी है तो मुझे इश्क़ है तुमसे...।                                       -सौरभ कुमार

वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए..

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वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए वो कांपते होठ भी होंगे...जिन्हें कुछ कहना होगा... वो टिमटिमाते नजरों के धुंधले नज़ारे होंगे मगर एक अजीब सी बेचैनी तड़प रही सिने में वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए..... .. जिया होगा मुकद्दर तक इन्तेजार की बाँहों में.. तिल तिल मरा होगा मुहब्बत, सुलगते दिल के आहों में.. मगर दिल-ए-तमन्ना है.. मुलाकात भी होगी.. बस... वो आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए.... .. उम्रे तमाम बीती होगी.. उम्मीदें तमाम ख़त्म होंगे.. गिनती बची सांसो की हो रही होगी.. आखरी दीदार जनाजे की तैयारी पुरे को होने होंगे.. दुआएं शांत यात्रा की किये जा रही होगी.. उस पल भी जहन में एक बात गूंजेगी.. ये आखिरी शाम भी तुम बिन गुजर न जाए... .. इन्तेजार तमाम उम्र की जान के, मुकद्दर तुम न होओगे.. जिया दुनिया के रश्मो से.. सोचा खुश तुम तो होओगे.. ..मगर चाहत-ए-इश्क़ एक बाकी थी.. रूबरू हम भी होयेंगे.. ढूंढती, जागती, तड़पती आँखों के सपनों में....एक दफा हम भी खोएंगे.. मगर वक्त के गुजरते दौर ने कब उम्र तमाम ख़त्म कर दी होगी साँस कुछ बाकि कुछ चल रही होगी वो आखरी शाम भी तुम बिन गुज...

मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ..

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मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ.. एक हसीन सी ख़्वाब के सहारे जी रहा हूँ... मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ... इश्क़ कहते है लोग जिन बेचैन धड़कनो को... ...झेल कर उन धड़कनों के नज़ारे, जी रहा हूँ.. वो मधुरई शाम सी आँखों के बेचारे मर रहा हूँ... वो मुश्कान की मासूमियत के सहारे जी रहा हूँ... देखता हूँ तुम्हे जब भी अक्स आईने के आगे... .... ढूंढता हूँ खुद में.. मिलन मोह के धागे... मैं काबिल भी हूँ तेरे साथ चलने को...विचारे जी रहा हूँ.. मुहब्बत के समंदर के किनारे जी रहा हूँ..।।                                             -सौरभ कुमार

लड़कियां...

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किस तक़दीर की बात करते हो साहब .............रोटी की जुगाड़ में नसीब देखना भूल गए, ..इन बेटियों को कवन कहे पापा की प्रिंसेस ...........इन्हेंपाकर तो हर बाप के किस्मत खुल गए। ...महंगी आभूषणों की के बात करू साहब. ...........लोग गरीब कहते है इन्हे .....मगर खाली पेट से... दर्द में मुस्कुरा दे ............इसेभी नसीब कहते है....। ...किस बात के मंदिर मांगू इनको... किस बात की देवी मइया .........बहन के बदन के दर्द को समझ न सका कोई भईया..... तलवारों के रैली से क्या रोक सकोगे भूख को ......क्या सूरज पे भी पहरा है जो रोक सकोगे धुप को ....इंसान समझ न आता जिनको भगवान समझने बैठे है .........और अब भी पाखंडी, बेटियों को सामान समझके बैठे है .....जिन बहनों को भर पेट रोटी है,  नए कपड़ो की थान है. ................लंबी लंबी गाड़ी है  ऊँचे ऊँचे मकान है, ..जरा उन बहनों से कहना है.. ..........जब एक देश में सबको रहना है ..... लाचार बहनो के साथ बनो. ............उनके अच्छे जीवन की एक नई सुरुआत बनो .....तुम सामान नहीं इंसान भी हो. ..धरती पे एक वरदान भी हो. .......हम मानवता के ...

लोग कहते तो है पर बेटियां पराई नहीं होती..

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वो भोली सी सूरत वो प्यारी सी शाम... किल्कारिओ की आँगन, रौशन मकान.. ... बधाइयों के मेले.. धीमी सी मुस्कान.. मगर फिर भी दिल दुखी है... ..............................वाह रे इंसान जना जिसे माँ ने वो दीपक नहीं था.. कुल का वारिश नहीं है, बेटा नहीं था.. ... मगर नन्ही सी कोमल बाती जरूर है... तेरे हर मुसीबत में साथी जरूर है क्या हुआ अगर आँगन में गुड़िया खेलेगी पापा के बाँहों में झूला झुलेगी.. ....अगर ख़्वाइसों  के पर भी निकले तो.. क्या हुआ अगर वो कोई ख़्वाब ही बून ले तो.. ..बेटियां है वो, मूरत नहीं है... जिन्दा है तो कोई मंजिल ही चुन ले तो.. .. लाचार होती है बेटियां ये समाज कहता है.. मगर कल्पना कमजोर नहीं थी ये हर आवाज कहता है.. बराबर का मौका दे कर तो देखो  छु लेगी मुकद्दर, समय का आगाज कहता है... ..  बेटियों को जनने से रुस्वाई नहीं होती... लोग कहते तो है, पर बेटियां पराई नहीं होती।।                                              -स...