कैसे कहूँ....

Kaise kahu... poem

इन आँखों की रवानी भी कैसे कहूँ..
हाल-ए-दिल जुबानी भी कैसे कहूँ

समझ नहीं आता तेरे इन्तेजार में जीकर
तेरी बेरुखी को तेरी नादानी भी कैसे कहूँ..

कभी रात के चकोरों से तेरा हाल पूछता हूँ..
रंगीन तितलियों से सूरत-ए-बहाल पूछता हूँ..
पता है कई राज छुपाए हो मुझसे....
मगर उन बहानो को कहानी भी कैसे कहूँ..

तेरे मुस्कुराहटों के पीछे के आँशु को देखे है मैंने...
तुम चाह कर भी दूर नहीं हो मुझसे...
धड़कता आज भी दिल तुम्हारा मेरे लिए है
मगर इन दूरियों को आख़री निशानी भी कैसे कहूँ...।
                                                    -सौरभ कुमार
          

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